God Is Great - God's Way Is Still The Best Way. Spiritual Motivational Story

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Life is good because God is great

  • Spending time with God through prayer and His Word is a prerequisite for having a great life and fulfilling your purpose.
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छल Cheating Deceit

छल और प्रेम दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं और दोनों ही बहुत सुंदर व क्रूर हैं लेकिन जो दोनों में फर्क रह जाता है वह फर्क है स्वार्थ और निस्वार्थ भाव का
  निस्वार्थ भाव से किया गया छल - छलिया मोहन के जैसा है जो हमारे दिल को प्रेम से भर देता है। 
 कई बार बिल्कुल इसी तरह हमारे छोटे बच्चे भी हमें कई बार मूर्ख बना जाते हैं छल लेते हैं लेकिन उनका यह छलना हमें मूर्ख बनाना हमें और प्रेम से भर देता है- अपने बच्चों की मासूमियत के पीछे उनका नटखट पन उनका हमें मूर्ख बना देना इस मूर्खता में भी हम आनंदित हो जाते हैं - यह छल होने के बावजूद भी छल नहीं है प्रेम का रूप है ☺️ 

स्वार्थी भाव से किया गया छल - यह बिल्कुल दुर्योधन के जैसा है कैकई के जैसा है मंथरा के जैसा है रावण के जैसा है और इस कलयुग के दौर में कयामत के दौर में यह छल का दूसरा रूप ही अधिकतर सामने नजर आता है -  स्वार्थ और निस्वार्थ भाव में किया गया छल दोनों ही देखने में मासूमियत से भरपूर दिखते हैं लेकिन जहां निस्वार्थ रूपी किया गया छल प्रेम में बदल जाता है वही स्वार्थ रूपी किया गया छल पाप में ✍️

जिंदगी में आप भी कभी ना कभी छल के शिकार हुए होंगे और मेरे पास बहुत से लोग ऐसे भी आते हैं जिनके दिल में यही पीड़ा होती है कि वह छल के शिकार हो गए हैं। जिंदगी में मैं भी कई बार छल का शिकार हुआ पीड़ा हुई लेकिन स्थाई रूप पर नहीं बिल्कुल ही टेंपरेरी जैसे कि पानी की लकीर या फिर रेत की लकीर 
 छल आपको दुखी तभी करता है जब आपने बहुत सारी उम्मीदें लगाई हो आपके साथ छल के साथ-साथ आपकी उम्मीदों का भी कत्ल हो जाता है- तो यह दर्द आपको जिंदगी भर आपके सीने में आपको तकलीफ देता है।

 लेकिन मैंने कभी भी कोई उम्मीद नहीं लगाई उम्मीद सिर्फ एक परमपिता परमात्मा परवरदिगार मालक से है। मेरे सीने में यह अलख भी शायद उसी मालिक ने जगाई होगी परमपिता परमात्मा ने - शायद इसी वजह से कभी भी मैं छल की वजह से बहुत ज्यादा समय तक परेशान नहीं हो पाया या यूं कहें ना उम्मीदें थी ना उम्मीदों का कत्ल हुआ-  जब डोरी परमात्मा के हाथ में हो उसके साथ कोई भी उसे छल करके तकलीफ नहीं पहुंचा सकता।
  इसीलिए आप सतगुरु तेग बहादुर साहब जी वचन करते हैं 
     संग सखा सब तज गए कोई ना निभियो साथ।
       कहु नानक इह विपत में टेक  एक रघुनाथ।।

इसीलिए मौज लो रोज लो नहीं मिले तो खोज लो आनंदित रहो बेकार की उम्मीद दुनिया से नहीं बल्कि दीन धर्म से लगा कर रखो परमपिता परमात्मा से - टेक एक रघुनाथ 👣🌺🙏
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बहरा आदमी सत्संग सुनने क्यों आता था ?


एक संत के पास बहरा आदमी सत्संग सुनने आता था । उसे कान तो थे पर वे नाड़ियों से जुड़े नहीं थे । एकदम बहरा, एक शब्द भी सुन नहीं सकता था । किसी ने संतश्री से कहा :-
” बाबा जी ! वे जो वृद्ध बैठे हैं, वे कथा सुनते-सुनते हँसते तो हैं पर वे बहरे हैं । “

बहरे मुख्यतः दो बार हँसते हैं – एक तो कथा सुनते-सुनते जब सभी हँसते हैं तब और दूसरा अनुमान करके बात समझते हैं तब अकेले हँसते हैं ।

बाबा जी ने कहा :- ” जब बहरा है तो कथा सुनने क्यों आता है ? रोज एकदम समय पर पहुँच जाता है । चालू कथा से उठकर चला जाय ऐसा भी नहीं है, घंटों बैठा रहता है । “

बाबाजी सोचने लगे, ” बहरा होगा तो कथा सुनता नहीं होगा और कथा नहीं सुनता होगा तो रस नहीं आता होगा । रस नहीं आता होगा तो यहाँ बैठना भी नहीं चाहिए, उठकर चले जाना चाहिए । यह जाता भी नहीं है ! ”

बाबाजी ने उस वृद्ध को बुलाया और उसके कान के पास ऊँची आवाज में कहा :- ” कथा सुनाई पड़ती है ? “

उसने कहा :- ” क्या बोले महाराज ? “

बाबाजी ने आवाज और ऊँची करके पूछा :- ” मैं जो कहता हूँ, क्या वह सुनाई पड़ता है ? “

उसने कहा :- ” क्या बोले महाराज ? “

बाबाजी समझ गये कि यह नितांत बहरा है…. बाबाजी ने सेवक से कागज कलम मँगाया और लिखकर पूछा ।

वृद्ध ने कहा :- ” मेरे कान पूरी तरह से खराब हैं । मैं एक भी शब्द नहीं सुन सकता हूँ । “
कागज कलम से प्रश्नोत्तर शुरू हो गया ।

बाबाजी :- ” फिर तुम सत्संग में क्यों आते हो ? “

” बाबाजी ! सुन तो नहीं सकता हूँ लेकिन यह तो समझता हूँ कि ईश्वरप्राप्त महापुरुष जब बोलते हैं तो पहले परमात्मा में डुबकी मारते हैं । संसारी आदमी बोलता है तो उसकी वाणी मन व बुद्धि को छूकर आती है लेकिन ब्रह्मज्ञानी संत जब बोलते हैं तो उनकी वाणी आत्मा को छूकर आती हैं । मैं आपकी अमृतवाणी तो नहीं सुन पाता हूँ पर उसके आंदोलन मेरे शरीर को स्पर्श करते हैं । दूसरी बात, आपकी अमृतवाणी सुनने के लिए जो पुण्यात्मा लोग आते हैं उनके बीच बैठने का पुण्य भी मुझे प्राप्त होता है । “

बाबा जी ने देखा कि ये तो ऊँची समझ के धनी हैं । उन्होंने कहा :- ” आप दो बार हँसना, आपको अधिकार है किंतु मैं यह जानना चाहता हूँ कि आप रोज सत्संग में समय पर पहुँच जाते हैं और आगे बैठते हैं, ऐसा क्यों ? “

” मैं परिवार में सबसे बड़ा हूँ । बड़े जैसा करते हैं वैसा ही छोटे भी करते हैं । मैं सत्संग में आने लगा तो मेरा बड़ा लड़का भी इधर आने लगा । शुरुआत में कभी-कभी मैं बहाना बना के उसे ले आता था । मैं उसे ले आया तो वह अपनी पत्नी को यहाँ ले आया, पत्नी बच्चों को ले आयी – सारा कुटुम्ब सत्संग में आने लगा, कुटुम्ब को संस्कार मिल गये । “

ब्रह्मचर्चा, आत्मज्ञान का सत्संग ऐसा है कि यह समझ में नहीं आये तो क्या, सुनाई नहीं देता हो तो भी इसमें शामिल होने मात्र से इतना पुण्य होता है कि व्यक्ति के जन्मों-जन्मों के पाप-ताप मिटने एवं एकाग्रतापूर्वक सुनकर इसका मनन-निदिध्यासन करे उसके परम कल्याण में संशय ही क्या !

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किसी की बुराइयों को देखने से पहले सकी भलाई को याद कर लेना जरूरी है

अगर कोई अच्छा इंसान बुरा काम करता है, तो क्या हमें उसके अच्छे काम भुला कर उसे बुरा समझना चाहिए?

एक राजा के पास दस जंगली कुत्ते थे। वह गलती करने वाले अपने किसी भी नौकर को उनके सामने दाल दिया करता था । एक बार एक नौकर ने गलती की इसलिए उसने आदेश दिया कि नौकर को कुत्तों के पास फेंक दिया जाए।

नौकर ने कहा, “मैंने आपको बीस साल तक सेवा दी है कृपया मुझे उन कुत्तों को फेंकने से पहले इनके साथ २० दिन बिताने का समय दे दीजिये ! " राजा मान गया।

जब बीस दिन बीत गए, तो राजा ने आदेश दिया कि सेवक को उसकी सजा के लिए कुत्तों को फेंक दिया जाए। जब वह अंदर फेंका गया, तो सभी बहुत हैरान थे कि सभी कुत्ते को केवल नौकर के पैर चाटते लगे!

राजा, जो वह देख रहा था उससे चकित होकर उसने कहा,

"मेरे कुत्तों को क्या हुआ है?"

नौकर ने जवाब दिया, "मैंने केवल बीस दिनों के लिए कुत्तों की सेवा की, और वे मेरी सेवा को नहीं भूले। मैंने आपको पूरे बीस साल तक सेवा की और आप मेरी पहली गलती पर सब कुछ भूल गए!"

राजा को अपनी गलती का एहसास हुआ और उसने नौकर को मुक्त करने का आदेश दिया।

हम इंसान किसी की एक गलती पर ही उसकी उन अच्छी चीजों को भूल जाते हैं पाता नहीं क्यों।

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ईमानदारी - जिन पर विश्वास करना लगभग नामुमकिन हो?

तस्वीर दिल्ली के एक साधारण टेक्सीचालक देबेन्द्र की है.

देबेन्द्र मूलतः बिहार के रहने वाले हैं.....

एक दिन देबेन्द्र की टैक्सी में काश्मीर का निवासी बैठा....उसे एयरपोर्ट से पहाड़गंज तक जाना था। देबेन्द्र ने उसको पहाड़गंज छोड़ा...... अपना किराया वसूला.. और वापिस टैक्सी स्टैंड की ओर चल पड़े। इसी बीच उनकी नज़र गाड़ी में पड़े एक बैग पर गयी।

बैग को उठाया तो समझने में क्षण भर भी ना लगा के यह सवारी का बैग है...... जिसे कुछ ही समय पहले वह पहाड़गंज छोड़ कर आये हैं। बैग को खंगाला तो देबेन्द्र दंग रह गये।

बैग में कुछ स्वर्ण आभूषण, एक एप्पल का लैपटॉप, एक कैमरा और कुछ नगद पैसे थे......

सब कुछ मिला के लगभग 7 या 8 लाख का सामान था।।

एक दम देबेन्द्र की आँखों के सामने फाइनेन्सर की तस्वीर आ गयी। इतने आभूषण बेच कर तो कर्जा आसानी से उतर सकता था। एक दम से प्रसन्न हो उठे।

मन में बैठा रावण जाग उठा। पराया माल अपना लगने लगा।

परन्तु जीवन की यही तो विडम्बना है।

मन में राम और रावण दोनों निवास करते हैं।

कुछ ही दूर गये थे के मन में बैठे राम जाग उठे। देबेन्द्र को लगा के वह कैसा पाप करने जा रहे थे।

नैतिकता आड़े आ गयी।

बड़ी दुविधा थी। एक ओर आभूषण सामने पड़े थे और दूजी ओर अपनी अंतरात्मा खुद को ही धिक्कार रही थी।

कुछ देर द्वंद चला पर अंत में विजय राम की ही हुई। देबेन्द्र पास के पुलिस स्टेशन गये और बैग ड्यूटी पर मौजूद थानेदार के हाथ में थमा दिया।

अब थानेदार कभी बैग में पड़े आभूषण देखे और कभी देबेन्द्र का चेहरा देखे.....थानेदार ने कहा के तू अगर चाहता तो यह बैग लेकर भाग सकता था।

देबेन्द्र ने जवाब दिया साहब हम "गरीब" हैं "बेईमान" नहीं हैं।

थानेदार भी निःशब्द हो गया। उसे लगा पता नहीं यह आदमी किस मिट्टी का बना है।

ख़ैर सवारी को उसका बैग सकुशल वापिस मिल गया। देबेन्द्र कि ईमानदारी के इनाम के रूप में मालिक ने उसे कुछ रुपये देने की पेशकश की तो देबेन्द्र ने साफ मना कर दिया।

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असल कथा अब शुरू होती है –

थानेदार ने देबेन्द्र की ईमानदारी की गाथा एक मीडियाकर्मी के आगे सुना दी ।

मीडियाकर्मी भी थानेदार की तरह अवाक रह गया। उसने देबेन्द्र की ईमानदारी की खबर अखबार में छापने की ठान ली ।

वह देबेन्द्र से मिला और उसका साक्षात्कार लेते हुये पूछा के अगर बैग में पड़े सामान की कीमत (8 लाख रुपये) उसे मिल जायें तो वह क्या करेगा।

देबेन्द्र ने आपबीती सुना दी। उसने कहा के पहले तो फाइनेन्सर का कर्जा चुकाएगा और फिर अगर सम्भव हुआ तो एक टैक्सी खरीदेगा।

पहले थानेदार हैरान हुआ था अब रिपोर्टर महोदय हैरान हो गये।

रिपोर्टर ने कहा के तेरे सर पर कर्ज़ है तो तू बैग लेकर भाग क्यों नहीं गया।

देबेन्द्र ने रिपोर्टर महोदय से भी कहा के साहब, हम गरीब हैं पर बेईमान नहीं हैं।

थानेदार की तरह अब रिपोर्टर को भी लगा के यह आदमी किस मिट्टी का बना है।

रिपोर्टर ने देबेन्द्र की ईमानदारी की गाथा एफ एम चैनल के एक रेडियो जॉकी को बताई।

एफ एम रेडियो के ज़रिए देबेन्द्र की कहानी दिल्लीवासियों को सुना दी गई...

साथ ही साथ दिल्ली वालों को देबेन्द्र के कर्ज के विषय में भी बताया। इसी के साथ एक खाता नम्बर भी दे दिया.... जिसमे धनराशि डाल कर वह ईमानदार देबेन्द्र का कर्ज़ा उतारने में उसकी मदद कर सकते थे।

2 घँटे......

मात्र 120 मिनट में

दिल्ली ने देबेन्द्र के खाते में 91751 रुपये डलवा दिये।

टोटल 8 लाख रुपये मिले मात्र 2 दिन में।।

सबने अपनी हैसियत के हिसाब से पैसा दिया........... और दिलवाली दिल्ली ने देबेन्द्र की ईमानदारी के उपहार में उसे ऋण मुक्त कर दिया।

लाखों लोगों ने देबेन्द्र की ईमानदारी को सराहा....

देबेन्द्र आज भी कहते हैं के मन के रावण को राम पर हावी ना होने देना उनके जीवन की सबसे बड़ी जीत थी। अगर वह बैग लेकर भाग जाते तो कर्ज़ा तो उतार लेते पर खुद को कभी माफ ना कर पाते।

मैं मानता हूँ के मन में बैठा रावण आज की व्यवस्था में हावी है। परन्तु बारीकी से देखें तो मन में बैठा राम आज भी दशानन का वध करने में सक्षम है।

अच्छाई और बुराई मे आज भी धागे भर का फासला है। इस ओर गये तो राम.....और उस ओर गये तो रावण।

देबेन्द्र ने दिल की सुनी और दिमाग के तर्क को नकार दिया।

दिल से सोचने वालों के लिये एक बड़ी खूबसूरत बात कही गयी है –

"दिल होता "लेफ्ट" में है....पर होता हमेशा राइट है..💞

यकीन न हो तो गूगल कर लीजिए कहानी बिल्कुल सच है।

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देश के किसान अन्नदाता या देशद्रोही!

#WeStandWithFarmers
जब किसान की बात आती है तो दो तरह की इमेज देखने को मिलती है एक तो इमेज है खुशहाल किसान और एक दूसरी इमेज भी दिखाई देती है जिसमें फटे हुए कपड़े सूखी हुई हड्डियों का ढांचा दीन हीन दुर्बल सा किसान और किसान की ऐसी फोटो बनाकर दिखाई जाती है कि जैसे किसान किसी भिखारी की तरह हो तरस का पात्र हो फोटो आपको दोनों ही नीचे देखने को मिलेगी।
   किसानों के प्रति मीडिया ने हमारी सोच ऐसी बना कर रखी है की किसान बस सिर्फ तंग हाल फटे कपड़े और आत्महत्या करते दिखाई देते हैं हमें भी लगता है कि किसान ऐसी ही होंगे और बस किसी तरह जी रहे हैं इसके लिए उन्हें सरकार का बहुत-बहुत धन्यवाद करना चाहिए लेकिन हकीकत यह नहीं है सभी किसान ऐसे ही है ।
 किसान भी खुशहाल हैं किसान ट्रैक्टरों के भी मालिक हैं गाड़ियों के भी मालिक हैं। किसानों का ट्रैक्टर और किसानों की गाड़ियां आज बहुत से लोगों की आंखों में चुभ रही हैं क्योंकि उन्हें तो मीडिया में यही दिखाया गया था कि सिर्फ हड्डियों का ढांचा फटे कपड़े निर्धन गरीब सा किसान उन्हें लगता है कि किसान तो वही है जिसके शरीर बहुत ही दुर्बल सा हो बिना स्केनर के ही शरीर की 206 हड्डियां दिखती हो फटे कपड़े हो टांके लगे हुए और खाली थाली लेकर बैठा हुआ होना चाहिए यही सोच बन चुकी है और इसी सोच के कारण जो किसान ट्रैक्टर और गाड़ियों में चल रहे हैं उन्हें वह सब के सब देशद्रोही और भाड़े के टट्टू पार्टी विशेष द्वारा भड़काऊ हुए लोग और विदेशी फंड पर पलने वाले बताया जा रहा है जैसी कि कुछ बिकाऊ मीडिया भी हमें दिखा रहा है।
  किसान देश का अन्नदाता है कोई फटे हाल भिखारी नहीं किसान देश का अन्नदाता है उसे भी हक है गाड़ियों में चलने का उसे भी हक है बढ़िया से बढ़िया ट्रैक्टर रखने का उसे भी हक है बढ़िया से बढ़िया कपड़े पहनने का सोच बदलो तभी देश बदलेगा।
  देश की असल जीडीपी किसान हैं और यह देश भी किसान प्रधान देश है देश के सभी किसान खुशहाल हो अमीर हो अपने-अपने ट्रेक्टर हो गाड़ियां हो ऐसी कामना करें ना कि सिर्फ कॉर्पोरेट जगत के लोगो की जो हमारा आपका आम लोगों का दिया हुआ टैक्स का पैसा लोन में लेकर देश से रफूचक्कर हो जाते हैं उनके 15 हजार करोड़ तो सेटलमेंट हो जाते हैं लेकिन एक किसान का ₹100000 का लोन सेटेलमेंट नहीं होता और उन्हें इतना प्रताड़ित किया जाता है कि उन्हें फांसी लगाकर मरना पड़ता है लेकिन फिर भी दुर्गति उनका पीछा नहीं छोड़ती है। 
 एक किसान की आमदनी पिछले 70 सालों में 21 गुना बढ़ी है लेकिन वही नौकरशाहों की आमदनी 181 गुना बढ़ गई है आज जो लोग ₹100000 तनख्वाह ले रहे हैं अगर उनका भी कैलकुलेशन करके किसानों की आमदनी के बराबर 21 गुना ही कर दिया जाए तो एक लाख से उनकी तनख्वाह 9000 पर आ जाएगी फिर आपको हर सरकारी ऑफिस में किसानों के जैसे ही रोज किसी न किसी कर्मचारी के फांसी पर लटकने की खबर आएगी। 
  सरकार ने करोना का फायदा उठाते हुए अपनी मनमर्जी से तीन कानून पास करवा लिए जो कि सिर्फ 30% ही किसान के हक में हैं और 70% किसान के खिलाफ में हैं। सबसे गंदा नियम तो पहला ही है जो कि स्टॉक मार्केट का अधिकार दे देता है और स्टॉक मार्केट करेंगे कौन क्या लगता है छोटे व्यापारी यह सब बड़े व्यापारियों का काम है जिनको सरकार ने कालाबाजारी करने की छूट दे दी है वह जैसे चाहेंगे वैसे ही होगा छोटे व्यापारियों का तो काम ही खत्म हो गया और कालाबाजारी स्टॉक मार्केट करने वालों को सरकार की मुहर भी मिल गई कि आपको अब कोई भी कुछ नहीं कहेगा युद्ध और सिर्फ आपदा के समय स्टॉक नहीं कर सकते उसके बिना आप स्टॉक कर सकते हैं सरकार का यह विधेयक के आगे प्रशासन भी फेल होगा क्योंकि जब भी कभी प्रशासन कालाबाजारी करने वालों पर छापा मारेगा तो वह तो पहले ही दिखा देंगे कि देखिए सरकार ने तो हमें परमिशन दी हुई है क्योंकि अभी ना तो युद्ध चल रहा है ना ही कोई आपदा घोषित हुआ है तो हम स्टॉक कर सकते हैं। समझ नहीं आता सरकार ने क्या सोचकर कालाबाजारी करने वालों के हक में यह कानून पास कर दिया। 
  बात रही एमएसपी की तो एमएसपी के जो आंकड़े हैं पूरी भारत में सिर्फ 6% अनाज ही सरकार खरीदती थी बाकी अनाज तो किसानों को बाहर ही बेचना पड़ता था और उसमें भी भ्रष्ट एफसीआई के कर्मचारी जो किसानों को भंडारण की क्षमता का हवाला देकर या फिर हमारे पास जगह नहीं है बोलकर एमएसपी रेट पर अनाज लेने से मना कर देते थे और फिर खुद दलाल बन कर खुद ही मंडी में जाकर खड़े होकर किसानों से अनाज खरीद कर उसी गोदाम में भर देते थे यह खेल जो भी लोग किसानी से जुड़े हुए हैं बड़े आराम से समझते होंगे। 
   फर्ज कीजिए सरकार ने कह दिया कि हम गेहूं ₹20 खरीदेंगे एमएसपी रेट पर लेकिन जब किसान अपना गेहूं लेकर एफसीआई के पास जाता है तो एफसीआई के जो सरकारी कर्मचारी भ्रष्ट हैं वह कहते हैं कि हमारे पास अनाज रखने का जगह नहीं है बोरा नहीं है किसान बेचारा दुखी होकर फिर मंडी में जाता है जहां पर कि पहले से ही व्यापारी दलाल बैठे हुए हैं व्यापारी दलाल कहता है यह हमारा तो रेट ₹12 है बेचना है तो ठीक नहीं तो घर ले जाओ किसान मजबूरी में अपना गेहूं ₹12 में बेच देता है वही पीछे छुपकर खड़ा सरकारी भ्रष्ट कर्मचारी दलाल के सामने आता है और कहता है कि उसने ₹12 भेजा है मैं देता हूं ₹14 यह गेहूं मुझे दे दो और वह ₹14 में गेहूं ले जाकर एफसीआई के गोदाम में भर देता है और कागजों में लिख देता है कि किसान से ₹20 के हिसाब से गेहूं खरीदा गया और सीधा-सीधा ₹6 का फायदा भ्रष्ट नौकरशाहों की जेल में चला जाता है। एमएसपी का तो खेल ही यही है अब किसान बेचारा करे तो करे क्या जाए तो जाए कहां🤔
  इस देश में सबसे बड़ा देशद्रोह और आतंकवाद भ्रष्टाचार है और इस भ्रष्टाचार रूपी आतंकवादी आग में सरकार अपना हाथ नहीं डालना चाहती है पीछे हटना चाहती है भागना चाहती है जरूरत है देश से भ्रष्टाचार को खत्म करने की ना कि जो किसान अपने हक के लिए शांत मई प्रदर्शन कर रहे हैं उनको देशद्रोही देने की लेकिन सरकार यही कर रही है और दिमाग से पैदल व अंधभक्त बंधुआ मजदूरों को भी इस काम में लगाया हुआ है कि किसानों को देशद्रोही बोलो सोशल मीडिया पर बैठकर लेकिन यह झूठ चलने वाला नहीं है। 
   किसान को उनका हक मिलना चाहिए और जो भ्रष्ट सिस्टम नौकरशाह अफसरशाही हैं सरकार को सख्त कदम उठाकर भ्रष्टाचार में लिप्त मगरमच्छों पर नकेल कसनी चाहिए ना की रामदेव के जैसे सलवार पहनकर भागना चाहिए या फिर अपने आप को मजबूत किले में किला बंद करके यह कहे कि हमें कोई फर्क नहीं पड़ता। 
  देश की जनता भी मजबूत सरकार चाहती है और इसीलिए बहुत ही लंबे समय के बाद बहुत सारी लंगडी सरकारों को और कमजोर सरकार को देखने के बाद देश की जनता ने एक मजबूत सरकार बनाई है लेकिन यह मजबूत सरकार का फर्ज बनता है कि अपनी जनता को भी किसान को भी मजबूत करें ना कि सिर्फ कॉर्पोरेट जगत के लोगों को ही और खुले आम तौर पर कालाबाजारी करने की इजाजत और अपने भ्रष्ट नौकरशाह नौकरशाही पर कबूतर के जैसे आंख मूंद कर बैठ जाए। 
  देश के जवान और किसान दोनों ही देश के लिए महत्वपूर्ण हैं। आज सिर्फ यही कहा जा रहा है कि यह पंजाब हरियाणा और राजस्थान के ही किसान हैं जो आवाज उठा रहे हैं लेकिन शायद उनकी याददाश्त कमजोर है जब 1950 में आंध्र प्रदेश के लोगों ने भाषा के आधार पर राज्यों का पुनर्गठन का विचार पेश किया था तो देश की दो दो आयोग और देश के प्रधानमंत्री नेहरु जी ने भी इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया और कुचलने की कोशिश की लेकिन जनता के प्रदर्शन से आगे सरकार को बाद में झुकना पड़ा सिर्फ आंध्र प्रदेश का ही गठन नहीं हुआ आंध्र प्रदेश भारत का सबसे पहला राज्य है उसके साथ साथ ही पूरे भारत में भाषा के आधार पर राज्यों के गठन किए गए जो कि उस समय की हकूमत और हकूमत ने जो 2- 2 आयोग बिठाए थे दोनों ने इस प्रस्ताव को खारिज कर दिया था. 
   भारत माता की जय का सिर्फ नारा लगाने से काम नहीं चलेगा जो भारत माता के बच्चे हैं किसान हैं उनका भी ख्याल रखना पड़ेगा अगर मां के बच्चे ही भूखे नंगे फटे हाल और आत्महत्या करने को मजबूर हैं तो माता कैसे खुश रह सकती है माता की जय जय कार करने से मां खुश नहीं होती। इसीलिए सरकार को भारत माता जय की नारा लगवाने के साथ ही भारत माता के जो बच्चे हैं रखना पड़ेगा रखना चाहिए और यह सरकार का फर्ज है इसीलिए देश की जनता ने एक मजबूत सरकार को समर्थन दिया है। इसलिए समर्थन नहीं दिया कि अपनी मनमर्जी से कालाबाजारी करने वालों को बड़े कारपोरेट घरानों को फायदा पहुंचाने वाले काले कानून बनाएं और देश की जनता जो कि अधिकतर किसान है उसका गला घोटने का काम करें।

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कर्म फल भोग Karma Fal

 कर्मफल का भोग टलता नहीं 

एक राजा बड़ा धर्मात्मा, न्यायकारी और परमेश्वर का भक्त था। उसने ठाकुरजी का मंदिर बनवाया और एक ब्राह्मण को उसका पुजारी नियुक्त किया। वह ब्राह्मण बड़ा सदाचारी, धर्मात्मा और संतोषी था। वह राजा से कभी कोई याचना नहीं करता था, राजा भी उसके स्वभाव पर बहुत प्रसन्न था। उसे राजा के मंदिर में पूजा करते हुए बीस वर्ष गुजर गये। उसने कभी भी राजा से किसी प्रकार का कोई प्रश्न नहीं किया।
राजा के यहाँ एक लड़का पैदा हुआ। राजा ने उसे पढ़ा लिखाकर विद्वान बनाया और बड़ा होने पर उसकी शादी एक सुंदर राजकन्या के साथ करा दी। शादी करके जिस दिन राजकन्या को अपने राजमहल में लाये उस रात्रि में राजकुमारी को नींद न आयी। वह इधर-उधर घूमने लगी जब अपने पति के पलंग के पास आयी तो क्या देखती है कि हीरे जवाहरात जड़ित मूठेवाली एक तलवार पड़ी है।

जब उस राजकन्या ने देखने के लिए वह तलवार म्यान में से बाहर निकाली, तब तीक्ष्ण धारवाली और बिजली के समान प्रकाशवाली तलवार देखकर वह डर गयी व डर के मारे उसके हाथ से तलवार गिर पड़ी और राजकुमार की गर्दन पर जा लगी। राजकुमार का सिर कट गया और वह मर गया।

राजकन्या पति के मरने का बहुत शोक करने लगी। उसने परमेश्वर से प्रार्थना की कि 'हे प्रभु ! मुझसे अचानक यह पाप कैसे हो गया? पति की मृत्यु मेरे ही हाथों हो गयी। आप तो जानते ही हैं, परंतु सभा में मैं सत्य न कहूँगी क्योंकि इससे मेरे माता-पिता और सास-ससुर को कलंक लगेगा तथा इस बात पर कोई विश्वास भी न करेगा।'

प्रातःकाल में जब पुजारी कुएँ पर स्नान करने आया तो राजकन्या ने उसको देखकर विलाप करना शुरु किया और इस प्रकार कहने लगीः "मेरे पति को कोई मार गया।" लोग इकट्ठे हो गये और राजा साहब आकर पूछने लगेः "किसने मारा है?"

वह कहने लगीः "मैं जानती तो नहीं कि कौन था। परंतु उसे ठाकुरजी के मंदिर में जाते देखा था" राजा समेत सब लोग ठाकुरजी के मंदिर में आये तो ब्राह्मण को पूजा करते हुए देखा।
उन्होंने उसको पकड़ लिया और पूछाः "तूने राजकुमार को क्यों मारा?"

ब्राह्मण ने कहाः "मैंने राजकुमार को नहीं मारा। मैंने तो उनका राजमहल भी नहीं देखा है। इसमें ईश्वर साक्षी हैं। बिना देखे किसी पर अपराध का दोष लगाना ठीक नहीं।"

ब्राह्मण की तो कोई बात ही नहीं सुनता था। कोई कुछ कहता था तो कोई कुछ.... राजा के दिल में बार-बार विचार आता था कि यह ब्राह्मण निर्दोष है परंतु बहुतों के कहने पर राजा ने ब्राह्मण से कहाः,

"मैं तुम्हें प्राणदण्ड तो नहीं देता लेकिन जिस हाथ से तुमने मेरे पुत्र को तलवार से मारा है, तेरा वह हाथ काटने का आदेश देता हूँ।"

ऐसा कहकर राजा ने उसका हाथ कटवा दिया। इस पर ब्राह्मण बड़ा दुःखी हुआ और राजा को अधर्मी जान उस देश को छोड़कर विदेश में चला गया। वहाँ वह खोज करने लगा कि कोई विद्वान ज्योतिषी मिले तो बिना किसी अपराध हाथ कटने का कारण उससे पूछूँ।

किसी ने उसे बताया कि काशी में एक विद्वान ज्योतिषी रहते हैं। तब वह उनके घर पर पहुँचा। ज्योतिषी कहीं बाहर गये थे, उसने उनकी धर्मपत्नी से पूछाः "माताजी ! आपके पति ज्योतिषी जी महाराज कहाँ गये हैं?"

तब उस स्त्री ने अपने मुख से अयोग्य, असह्य दुर्वचन कहे, जिनको सुनकर वह ब्राह्मण हैरान हुआ और मन ही मन कहने लगा कि "मैं तो अपना हाथ कटने का कारण पूछने आया था, परंतु अब इनका ही हाल पहले पूछूँगा।"

इतने में ज्योतिषी आ गये। घर में प्रवेश करते ही ब्राह्मणी ने अनेक दुर्वचन कहकर उनका तिरस्कार किया। परंतु ज्योतिषी जी चुप रहे और अपनी स्त्री को कुछ भी नहीं कहा। तदनंतर वे अपनी गद्दी पर आ बैठे। ब्राह्मण को देखकर ज्योतिषी ने उनसे कहाः "कहिये, ब्राह्मण देवता ! कैसे आना हुआ?"

आया तो था अपने बारे में पूछने के लिए परंतु पहले आप अपना हाल बताइये कि आपकी पत्नी अपनी जुबान से आपका इतना तिरस्कार क्यों करती है? जो किसी से भी नहीं सहा जाता और आप सहन कर लेते हैं, इसका कारण है?"

"यह मेरी स्त्री नहीं, मेरा कर्म है। दुनिया में जिसको भी देखते हो अर्थात् भाई, पुत्र, शिष्य, पिता, गुरु, सम्बंधी - जो कुछ भी है, सब अपना कर्म ही है। यह स्त्री नहीं, मेरा किया हुआ कर्म ही है, और यह भोगे बिना कटेगा नहीं।
अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभम्। नाभुक्तं क्षीयते कर्म कल्पकोटिशतेरपि॥

अपना किया हुआ जो भी कुछ शुभ-अशुभ कर्म है, वह अवश्य ही भोगना पड़ता है। बिना भोगे तो सैंकड़ों-करोड़ों कल्पों के गुजरने पर भी कर्म नहीं टल सकता।' इसलिए मैं अपने कर्म खुशी से भोग रहा हूँ और अपनी स्त्री की ताड़ना भी नहीं करता, ताकि आगे इस कर्म का फल न भोगना पड़े।"

"महाराज ! आपने क्या कर्म किया था?"

"सुनिये, पूर्वजन्म में मैं कौआ था और मेरी स्त्री गधी थी। इसकी पीठ पर फोड़ा था, फोड़े की पीड़ा से यह बड़ी दुःखी थी और कमजोर भी हो गयी थी। मेरा स्वभाव बड़ा दुष्ट था, इसलिए मैं इसके फोड़े में चोंच मारकर इसे ज्यादा दुःखी करता था। जब दर्द के कारण यह कूदती थी तो इसकी फजीहत देखकर मैं खुश होता था। मेरे डर के कारण यह सहसा बाहर नहीं निकलती थी किंतु मैं इसको ढूँढता फिरता था। यह जहाँ मिले वहीं इसे दुःखी करता था। आखिर मेरे द्वारा बहुत सताये जाने पर त्रस्त होकर यह गाँव से दस-बारह मील दूर जंगल में चली गयी। वहाँ गंगा जी के किनारे सघन वन में हरा-हरा घास खाकर और मेरी चोटों से बचकर सुखपूर्वक रहने लगी। लेकिन मैं इसके बिना नहीं रह सकता था। इसको ढूँढते-ढूँढते मैं उसी वन में जा पहुँचा और वहाँ इसे देखते ही मैं इसकी पीठ पर जोर-से चोंच मारी तो मेरी चोंच इसकी हड्डी में चुभ गयी। इस पर इसने अनेक प्रयास किये, फिर भी चोंच न छूटी। मैंने भी चोंच निकालने का बड़ा प्रयत्न किया मगर न निकली। 'पानी के भय से ही यह दुष्ट मुझे छोड़ेगा।' ऐसा सोचकर यह गंगाजी में प्रवेश कर गयी परंतु वहाँ भी मैं अपनी चोंच निकाल न पाया। आखिर में यह बड़े प्रवाह में प्रवेश कर गयी। गंगा का प्रवाह तेज होने के कारण हम दोनों बह गये और बीच में ही मर गये। तब गंगा जी के प्रभाव से यह तो ब्राह्मणी बनी और मैं बड़ा भारी ज्योतिषी बना। अब वही मेरी स्त्री हुई। जो मेरे मरणपर्यन्त अपने मुख से गाली निकालकर मुझे दुःख देगी और मैं भी अपने पूर्वकर्मों का फल समझकर सहन करता रहूँगा, इसका दोष नहीं मानूँगा क्योंकि यह किये हुए कर्मों का ही फल है। इसलिए मैं शांत रहता हूँ। अब अपना प्रश्न पूछो।"

ब्राह्मण ने अपना सब समाचार सुनाया और पूछाः "अधर्मी पापी राजा ने मुझ निरपराध का हाथ क्यों कटवाया?"

ज्योतिषीः "राजा ने आपका हाथ नहीं कटवाया, आपके कर्म ने ही आपका हाथ कटवाया है।"
"किस प्रकार?"
"पूर्वजन्म में आप एक तपस्वी थे और राजकन्या गौ थी तथा राजकुमार कसाई था। वह कसाई जब गौ को मारने लगा, तब गौ बेचारी जान बचाकर आपके सामने से जंगल में भाग गयी। पीछे से कसाई आया और आप से पूछा कि "इधर कोई गाय तो नहीं गया है?"

आपने प्रण कर रखा था कि 'झूठ नहीं बोलूँगा।' अतः जिस तरफ गौ गयी थी, उस तरफ आपने हाथ से इशारा किया तो उस कसाई ने जाकर गौ को मार डाला। गंगा के किनारे वह उसकी चमड़ी निकाल रहा था, इतने में ही उस जंगल से शेर आया और गौ एवं कसाई दोनों को खाकर गंगाजी के किनारे ही उनकी हड्डियाँ उसमें बह गयीं। गंगाजी के प्रताप से कसाई को राजकुमार और गौ को राजकन्या का जन्म मिला एवं पूर्वजन्म के किये हुए उस कर्म ने एक रात्रि के लिए उन दोनों को इकट्ठा किया। क्योंकि कसाई ने गौ को हंसिये से मारा था, इसी कारण राजकन्या के हाथों अनायास ही तलवार गिरने से राजकुमार का सिर कट गया और वह मर गया। इस तरह अपना फल देकर कर्म निवृत्त हो गया। तुमने जो हाथ का इशारा रूप कर्म किया था, उस पापकर्म ने तुम्हारा हाथ कटवा दिया है। इसमें तुम्हारा ही दोष है किसी अन्य का नहीं, ऐसा निश्चय कर सुखपूर्वक रहो।"

कितना सहज है ज्ञानसंयुक्त जीवन ! यदि हम इस कर्मसिद्धान्त को मान लें और जान लें तो पूर्वकृत घोर से घोर कर्म का फल भोगते हुए भी हम दुःखी नहीं होंगे बल्कि अपने चित्त की समता बनाये रखने में सफल होंगे.
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तीन गुरु Three Guru

बहुत समय पहले की बात है, किसी नगर में एक बेहद प्रभावशाली महंत रहते थे । उन के पास शिक्षा लेने हेतु कई शिष्य आते थे। 

एक दिन एक शिष्य ने महंत से सवाल किया,

 स्वामीजी आपके गुरु कौन है? 

आपने किस गुरु से शिक्षा प्राप्त की है?

” महंत शिष्य का सवाल सुन मुस्कुराए और बोले, मेरे हजारो गुरु हैं! यदि मै उनके नाम गिनाने बैठ जाऊ तो शायद महीनो लग जाए। लेकिन फिर भी मै अपने तीन गुरुओ के बारे मे तुम्हे जरुर बताऊंगा।

एक था चोर।

एक बार में रास्ता भटक गया था और जब दूर किसी गाव में पंहुचा तो बहुत देर हो गयी थी। सब दुकाने और घर बंद हो चुके थे। 

लेकिन आख़िरकार मुझे एक आदमी मिला जो एक दीवार में सेंध लगाने की कोशिश कर रहा था। मैने उससे पूछा कि मै कहा ठहर सकता हूं, तो वह बोला की आधी रात गए इस समय आपको कहीं आसरा मिलना बहुत मुश्किल होंगा, 
लेकिन आप चाहे तो मेरे साथ ठहर सकते हो। मै एक चोर हु और अगर एक चोर के साथ रहने में आपको कोई परेशानी नहीं होंगी तो आप मेरे साथ रह सकते है।

वह इतना प्यारा आदमी था कि मै उसके साथ एक महीने तक रह गया! वह हर रात मुझे कहता कि मै अपने काम पर जाता हूं, आप आराम करो, प्रार्थना करो। 

जब वह काम से आता तो मै उससे पूछता की कुछ मिला तुम्हे? 
तो वह कहता की आज तो कुछ नहीं मिला पर अगर भगवान ने चाहा तो जल्द ही जरुर कुछ मिलेगा। वह कभी निराश और उदास नहीं होता था, हमेशा मस्त रहता था।

जब मुझे ध्यान करते हुए सालों-साल बीत गए थे और कुछ भी हो नहीं रहा था तो कई बार ऐसे क्षण आते थे कि मैं बिलकुल हताश और निराश होकर साधना-वाधना छोड़ लेने की ठान लेता था। 

और तब अचानक मुझे उस चोर की याद आती जो रोज कहता था कि भगवान ने चाहा तो जल्द ही कुछ जरुर मिलेगा।

और मेरा दूसरा गुरु एक कुत्ता था।

एक बहुत गर्मी वाले दिन मै बहुत प्यासा था और पानी के तलाश में घूम रहा था कि एक कुत्ता दौड़ता हुआ आया। वह भी प्यासा था। पास ही एक नदी थी। 

उस कुत्ते ने आगे जाकर नदी में झांका तो उसे एक और कुत्ता पानी में नजर आया जो की उसकी अपनी परछाई थी। 
कुत्ता उसे देख बहुत डर गया। वह परछाई को देखकर भौकता और पीछे हट जाता, लेकिन बहुत प्यास लगने के कारण वह वापस पानी के पास लौट आता। 

अंततः, अपने डर के बावजूद वह नदी में कूद पड़ा और उसके कूदते ही वह परछाई भी गायब हो गई। उस कुत्ते के इस साहस को देख मुझे एक बहुत बड़ी सिख मिल गई। 
अपने डर के बावजूद व्यक्ति को छलांग लगा लेनी होती है। सफलता उसे ही मिलती है जो व्यक्ति डर का साहस से मुकाबला करता है।

और मेरा तीसरा गुरु एक छोटा बच्चा है।

मै एक गांव से गुजर रहा था कि मैंने देखा एक छोटा बच्चा एक जलती हुई मोमबत्ती ले जा रहा था। वह पास के किसी गिरजाघर में मोमबत्ती रखने जा रहा था। 

मजाक में ही मैंने उससे पूछा की क्या यह मोमबत्ती तुमने जलाई है ? 

वह बोला, जी मैंने ही जलाई है। तो मैंने उससे कहा की एक क्षण था जब यह मोमबत्ती बुझी हुई थी और फिर एक क्षण आया जब यह मोमबत्ती जल गई। 
क्या तुम मुझे वह स्त्रोत दिखा सकते हो जहा से वह ज्योति आई ?
वह बच्चा हँसा और मोमबत्ती को फूंख मारकर बुझाते हुए बोला, अब आपने ज्योति को जाते हुए देखा है। कहा गई वह ? आप ही मुझे बताइए।
मेरा अहंकार चकनाचूर हो गया, मेरा ज्ञान जाता रहा। और उस क्षण मुझे अपनी ही मूढ़ता का एहसास हुआ। तब से मैंने कोरे ज्ञान से हाथ धो लिए।

भक्तों, शिष्य होने का अर्थ क्या है? 

शिष्य होने का अर्थ है पुरे अस्तित्व के प्रति खुले होना। हर समय हर ओर से सीखने को तैयार रहना।जीवन का हर क्षण, हमें कुछ न कुछ सीखने का मौका देता है। 

हमें जीवन में हमेशा एक शिष्य बनकर अच्छी बातो को सीखते रहना चाहिए। यह जीवन हमें आये दिन किसी न किसी रूप में किसी गुरु से मिलाता रहता है, 

यह हम पर निर्भर करता है कि क्या हम उस महंत की तरह एक शिष्य बनकर उस गुरु से मिलने वाली शिक्षा को ग्रहण कर पा रहे हैं की नहीं!
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